टमाटर की कहानी, टमाटर की ज़बानी

10:28 PM



नमस्कार!  मैं हूँ टमाटर.  मुझे तो जानते ही होंगे? 
वही, जिसे आप आज कल कमा कर भी नही खा पा रहे हैं...  लोल!
आपकी सब्ज़ी, सलाद, और बस यूँ ही लोगों पर पड़ने वाली चीज़ हूँ.

अभी कुछ दिनों पहले से ही मेरे भाव कुछ बढ़ गये हैं. आख़िर क्यू ना बढ़े, अमाँ हमें भी बुरा लगता है, जब हमें ना तो ठीक से सब्जी की केटेगरी में रखा जाता है, ना फलों की.
और तो और हमारे जैसे ही लाल सेब हमसे इतना महेंगा है, तो हमे भी कोफ़्त होती है. फिर क़रीब एक दशक पहले, जब हमारे तामसिक मित्र प्याज़ ने अपने भाव आसमान को छू लिए, तब हमने भी एक कसम खा ली, एक दिन मौका देख के हम भी भाव बढ़ाएँगे.
बस फिर क्या, तबसे बाट जोह रहे थे. फाइनली मौका पा के हमने भी चौका मार ही दिया. अब भला क्रिकेट किसे नही पसंद? (माफ़ कीजिए ज़रा भावनाओं में बह जाते हैं हम कभी कभी!)

वैसे हर परिवर्तन के कुछ फायदे, कुछ नुकसान होते हैं. मगर इस परिवर्तन से तो बस नुकसान ही दिख रहा है. उदाहरण के लिए हमारे भाव बढ़ने की वजह से इंसान तो क्या हमारा खुद का परिवार मुझसे नाराज़ है. छोटा बेटा बोलता है की अब टॉमटीनो फेस्टिवल में कैसे जाएँगे. और तो और अब तो देश के लिए शहीद होने के लिए हम उन बेकार नेताओ पर भी नही मारे जा सकते हैं, क्यूँकि आपने हमारे भाव बड़ा रखें हैं.
आख़िर ऐसे कब तक चलेगा, हम कब तक बेरोज़गार पड़े रहेंगे.
चुटकी लेने के लिए मैने भी उन्हें कुछ मीम्स दिखाए. एक सुन्दर कन्या ने कानों में सोने की बालियों के स्थान पर हमें लटका रखा है. ये भी बताया की आज कल लोग एक दूसरे के घर जाते हैं तो मिठाई नही, २किलो हमें ही पैक करा ले जाते हैं. बताओ, इससे ज्यादा इज़्ज़त क्या मिलेगी?
बस तभी से घर में कोई हमसे बात ही नही कर रहा है.
आकस्मिक आपदायें जैसे की इस बार हुई अत्यधिक बारिश की वजह से मेरे कुनबे पर बड़ा अत्याचार हुआ, अमूमन आधे से ज़्यादा लोग मृत्यु को प्राप्त हुए और लगभग एक चौथाई लोगों ने घायल हो कर दम तोड़ दिया. बच गये हम. तो अब क्या व्यंग भी ना करें? तकलीफें इंसान को शायर बना देती हैं, हम तो बस कहानीकार बने बेठे हैं ज़रा सी आप बीती और कुछ नही. ऐसी वर्षा कभी नही देखी, नाना दादा के साथ भी कभी ऐसी अनहोनी नही घटी. और ये तो बस शुरुआत है. जिस तरह मानव जाति ग्लोबल वार्मिंग बड़ाने में जुटी हुई है, मेरी बड़ी हुई कीमत तो शायद अभी बहुत कम है.

अब मैं उन्हे और क्या जवाब दूं. क्या आप बता सकते हैं? शायद नही. मगर अब कुछ कह नही सकते तो कम से कम कुछ कर तो सकते हैं आप लोग की नही? ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ने से बचाएँ, ग्लेशियर पिघल रहा है, धरती की जलवायु बदल रही है. थोड़ा योगदान आप भी दें. ए.सी. कम इस्तेमाल करें, बिजली-पानी बचाने की हर संभव कोशिश करें. अमाँ यार, कुछ तो करें. नही तो जैसे आज मेरा परिवार मुझसे मेरे बड़े हुए भाव का कारण पूछता है, आपका परिवार शायद ये सब जानने के लिए रहे ही ना. कुछ दशकों से ग्लोबल वार्मिंग तथा आकस्मिक जलवायु परिवर्तन की मार सह सह के मेरा छिलका भी मोटा हो गया है, नोटीस तो आप सबने किया ही होगा, अब आसानी से नही गलता मैं. मगर इंसान ने कारण समझने की कोशिश नही की. खरीदने वाले मेरा छिलका उतार के इस्तेमाल कर लेते हैं और बेचने वाले मुझे इन्जेक्शन लगा के बेवकूफ़ बना लेते हैं.

वैसे लगता है की शायद ये इंसान कभी नही सुधरेगा. चलता हूँ. कोशिश करूँगा की इस बार बारिश की मार सह पाऊँ.

Sketch (c)kavk 2017

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